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राजनीतिक सिद्धांत और राजनीति दर्शन Rajnitik siddhant aur Rajniti Darshan

राजनीतिक सिद्धांत   Rajnitik siddhant aur Rajniti Darshan

डेविड ईस्टन ने राजनीति शास्त्र में सिद्धान्त की भूमिका और महत्व पर विशेष बल दिया है। ईस्टन को ही यह श्रेय जाता है कि उसने सर्वप्रथम राजनीति सिद्धान्त की आवश्यकताओं की ओर राजनीतिशास्त्रियों को आकर्षित किया। डेविड ईस्टन के अनुसार- "सिद्धान्त का निर्माण राजनीतिशास्त्र को व्यवस्थित विज्ञान बनाने की एक आवश्यक शर्त है और इसके अभाव में राजनीति शास्त्र व्यक्तित्व हीन है। डेविड़ ईस्टन के ही शब्दों में-"मैं यह तर्क  प्रस्तुt करूगा कि सिद्धान्त केकार्य भाग या भूमिका और इसकी संभावना की सचेत जानकारी के बिना,राजनीतिक अनुसंधlन खण्डयुकत और विजातीय होगा और अपने राजनीति विज्ञान अभियान के वचन को पूर्ण असमर्थ रहेगा l 
राजनीतिशास्त्र की परिभाषा के अन्तर्गत ‘राजनीति’ शब्द के संकुचित प्रयोग से उत्पन्न स्थिति के फलस्वरूप इसे दो भागों में विभाजित किया गया (1) सैद्धान्तिक राजनीति और व्यवहारिक (2) हल प्रयोगात्मक या प्रयोगात्मक राजनीति। सैद्धान्तिक राजनीति के अन्तर्गत राज्य की आधारभूत समस्याओ का अध्ययन किया जाता है। तात्पर्य यह है कि इमसें राज्य की उत्पति, प्रकृति और उद्देश्य राजनीतिक संगठन एवं प्रशासन के सिद्धान्त आदि का अध्ययन किया जाता है। इस तरह हम कह सकते हैं कि राजनीतिक सिद्धान्त के अन्तर्गत मुख्यता राज्य के सिद्धान्त (उत्पत्ती , शासन के अलग रूपो का वर्गीकरण और प्रभुसत्ता )सरकार के सिद्धान्त (संस्थाओं के प्रकार ,कार्यपालिका ,व्यवस्थापिका और कानून का क्षेत्र तथा उसकी सीमाएं, विधि निर्माण सम्बन्धी सिद्धांत, (विधि निर्माण के उद्देश्य तथा विधि निर्माण की प्रक्रिया, विधि का स्वरूप और स्वीकृति,व्यवस्था सम्बन्धी विवरण) और कृत्रिम व्यक्ति के रूप में राज्य के सिद्धान्त ( अन्य राज्यों तथा मानवीय सिद्धान्तों से सम्बद्ध अन्तर्राष्ट्रीय कानून) आदि तथ्यों का अध्ययन किया जाता है।
राजनीति दर्शन 
कुछ विद्वानों ने इस विषय की ‘राजनीति दर्शन' के नाम से भी सम्बोधित किया है। उनके अनुसार हमारे विषय की प्रकृति सैद्धान्तिक एवं दार्शनिक है, व्यवहारिक नहीं। अपने अध्ययन विषय के अन्तर्गति हम प्रमुख रुप से राजनीतिक संस्थाओं से समबन्धित आधारभूत तथ्यों का ही अध्ययन करते हैं, उनके क्रियाकलापों का नहीं। इस विषय के अन्तर्गत हम राज्यों की उत्पत्ति उनका विकास, प्रकृति, उद्देश्य, मानव अधिकार एवं कर्त्तव्य और राजनीतिक धारणाओं का अध्ययन करते हैं kयोंकि राज्य सम्बन्धी अध्ययन का मुख्य आधार ये सिद्धान्त ही हैं, इसलिये इसे राजनीतिक दर्शन ही कहा जाना चाहिए।
दर्शनशास्त्र में सम्पूर्ण विश्व का अध्ययन किया जाता है और राजनीति में विश्व के एक प्रमुख अंग राज्य' का अध्ययन किया जाता है अत: इसे एक दृष्टिकोण से राजनीति दर्शन कहना उचित है। जिस प्रकार दर्शन का आधार मात्र कल्पना और तर्क है, न कि विज्ञान, ठीक उसी प्रकार इस विषय का आधार भी विज्ञान न होकर कल्पना और तर्क ही है। इस मत की पुष्टि हालवेल के इस कथन से भी होती हैं कि- “राजनीति दर्शन का सम्बन्ध राजनीतिक संस्थाओं से उतना नहीं है, जितना उन संस्थाओं में सिन्नीहित विचारों और आकांक्षाओं से है। दिलचस्पी इसमें उतनी नहीं कि तथ्य कैसे घटित होते हैं, जितनी इसमें है कि क्या घटित होता है और क्यों?" 
इस प्रकार राजनीति विज्ञान और राज दर्शन में अन्तर है। वस्तुत: राजनीति विज्ञान राजनीति शास्त्र के अन्तर्गत आने वाले समस्त विषयों का बोध कराता है जबकि राजनीति दर्शन उसके
एक पहलू का। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि राजनीति दर्शन का सम्बन्ध राजनीतिक संस्थाओं में निहित विचारों और आकांक्षाओं से है, जब कि राजनीति विज्ञानं का सम्बन्ध समस्त राजनैतिक संस्थाओं, राजनैतिक प्रक्रियाओं और राजनीतिक व्यवस्था  के विविध पहलुओं से है।
वास्तव में राजनीति विज्ञान ही हमारे अध्ययन-विषय के अनुरूप है, क्योंकि इस शब्द के अन्तर्गत हमारा सम्पूर्ण अध्ययन आ जाता है। राजनीति विज्ञान शब्द विषय की प्रकृति को भी नितान्त स्पष्ट कर देता है। 'राजनीतिक दर्शन' शब्द से राजनीति विज्ञान का यथार्थ रूप प्रकट नहीं होता, लेकिन राजनीति विज्ञान कहने से स्पष्ट हो जाता है कि प्रस्तुत विषय एक विज्ञान और कला दोनों ही है।
इसके अतिरिक्त वर्तमान समय में विज्ञान का अर्थ 'एक क्रमबद्ध, तर्कपूर्ण और विकसित ज्ञान’ से लिया जाता है। इसलिये राजनीति विज्ञान ही इस विषय के लिए अधिक सम्मानप्रद संज्ञा हो सकती है। सेलेय ,बर्गेस, विलोबी, गैटल, गार्नर, लीकाक राजनीति विज्ञान शब्द को ही उपयुक्त मानते हैं। 1948 में यूनेस्को के तत्वावधान में हुए एक सम्मेलन में एकत्रित राजनीति विज्ञान के विद्वानों ने 'राजनीति विज्ञान' शब्द ही मान्य ठहराया। गिलाकराइस्ट ने ठीक ही कहा-“विवेक तथा प्रयोग के दृष्टिकोण से राजनीति विज्ञान ही सर्वाधिक उचित नाम है।'
जहाँ तक ‘राजनीति दर्शन' का सम्बन्ध है। इस विस्तृत विषय के लिए 'राजनीति दर्शन' का सम्बोधन उचित नहीं लगता, क्योंकि यह शब्द इसमें क्षेत्र को सैद्धान्तिक क्षेत्र तक ही सीमित कर देता है। इस शब्द के विषय सम्बन्धी स्पष्टता एवं निश्चितता का अभाव है तथा इसके साथ ही साथ राज्य सम्बन्धी विषयों का कोई वैज्ञानिक एवं तार्किक अध्ययन नहीं हो पाता है। अत: ‘राजनीति दर्शन' नाम उचित नहीं है। राजनीतिक सिद्धांत और राजनीति दर्शन Rajnitik siddhant aur Rajniti Darshan

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