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Saturday, March 3, 2018

राजनीतिशास्त्र का अर्थ एवं परिभाषा Rajniti Shastra ka Arth Avem Paribhasha

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 राजनीतिशास्त्र का अर्थ एवं परिभाषा  Rajniti Shastra ka Arth Avem Paribhasha 

मनुष्य के राजनीतिक जीवन का अध्ययन करने हेतु उन संस्थाओं की जानकारी प्राप्त
करना आवश्यक होता हैं, जिनके अन्तर्गत मनुष्य ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की,
जिसके द्वारा वह अपने राजनीतिक जीवन के विकास हेतु प्रयासरत है। इस प्रकार की राजनीतिक
संस्थाओं में राज्य सबसे प्रमुख हैं। राज्य अथवा समाज द्वारा मनुष्य अपने समस्त आवश्यकताओं
की पूर्ति करता है। मनुष्य की इन आवश्यकताओं तथा उनके सामाजिक सम्बन्धों के माध्यम से अनेक सामाजिक शास्त्रों का जन्म हुआ इन्हीं सामाजिक शास्त्रों के अन्तर्गत अन्तर्गत राजनीतिशास्त्र भी आता हैं। प्रत्येक सामाजिक शास्त्र सामाजिक जीवन के समग्र पहलुओं का अध्ययन नहीं करता वरन्
किसी एक पहलु का ही ,यही बात राजनितिशास्त्र पर भी लागु होती है। जहा तक राजनीतिशास्त्र के
अध्ययन का सवाल है इसके अन्तर्गत राज्य, सरकार, राजनीतिक संघटन तथा संस्थायें, राजनीतिक
क्रिया कलाप तथा राजनीतिक सम्बन्धों सहित राजनीतिक जीवन के समस्त पक्ष आ जाते हैं। इस विषय का जन्मदाता यूनानी चिंतक अरस्तु को माना जाता है। राजनीति शब्द की उत्पत्ति यूनानी भाषा के शब्द 'Polis' से मानी जाती है, जिसका आशय नगर राज्य से है। यह नगर-राज्य राजनीतिक दृष्टि से एक सर्वोच्च एवं अंतर्भावी (Inclusiv)संध था। प्राचीन यूनान में छोटे-छोटे नगर-राज्य हुआ करते थे तथा इन नगर राज्यों की शासन व्यवस्था को बोध होता था। बदलते हुए समय के साथ-साथ इन नगर राज्यों का स्वरूप क्रमशःविकसित तथा परिवर्तित होता गया और आधुनिक युग में नगर-राज्यों के स्थान पर राष्ट्र राज्य स्थापित हो गए।

         परिभाषा-अन्य शास्त्रों की भाँति राजनीति की परिभाषाओं में मतभेद है। इसकी परिभाषा को विद्वानों ने दो भागों में बाँटा है। प्रथम परम्परागत परिभाषा और द्वितीय आधुनिक परिभाषा।


 (1) परम्परागत परिभाषा-परम्परागत विद्वानों द्वारा इस विषय की विभिन्न परिभाषाएँ प्रस्तुत की गई हैं, जिन्हें मूलतः तीन वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है।

राजनीति विज्ञान केवल 'राज्य के अध्ययन के रूप में।

राजनीति विज्ञान केवल 'सरकार के अध्ययन के रूप में।

राजनीति विज्ञान 'राज्य और सरकार दोनों के अध्ययन के रूप में।

1. राज्य के अध्ययन के रूप में-कुछ राजनीतिशास्त्री राजनीतिशास्त्र को केवल राज्य के अध्ययन तक ही सीमित मानते हैं। फासी लेखक ब्लण्ट्सली, गार्नर, गेरीज़, जेलिनेक,लेविस इत्यादि इस वर्ग के लेखकों में प्रमुख हैं।

गार्नर के शब्दों में, राजनीतिशास्त्र का आरम्भ तथा अन्त राज्य से होता है।"
ब्लंटसली के मतानुसार, “राजनीति विज्ञान वह विज्ञान है जिसका सम्बन्ध राज्य से है।
और राज्य की आधारभूत स्थितियों, उसकी प्राण प्रकृति, उनके विविध रूपों तथा उसके विकास को समझने का प्रयत्न करता है।"

2. सरकार के अध्ययन के रूप में-कुछ विद्वान् राजनीति शास्त्र को सरकार के अध्ययन
के रूप में ही देखते हैं। इस वर्ग में स्टीफेन, लीकॉक तथा सीले जैसे विद्वानों का नाम विशेष उल्लेखनीय है।

लीकॉक के मतानुसार, राजनीतिशास्त्र सरकार से सम्बद्ध विधा है।"

सीले के मतानुसार, जिस प्रकार अर्थशास्त्र धन से, जीवविज्ञान जीवन से, रेखागणित
स्थान एवं दूरी से सम्बद्ध है, उसी प्रकार, राजनीतिशास्त्र सरकार से सम्बद्ध हैं।”

3. राज्य और सरकार दोनों के अध्ययन के रूप में कुछ विद्वानों ने व्यापक दृष्टिकोण का
परिचय दिया है और बताया है कि राजनीतिशास्त्र वह विज्ञान है, जो राज्य और सरकार दोनों का
अध्ययन करता है। ऐसे बिहारों में पालजेनेट, लास्की, गेटेल, गिलक्रिष्ट आदि के नाम आते हैं।
राज्य के आधार तथा सरकार के सिद्धान्तों पर विचार किया जाता है।

          पॉल जेनेट के अनुसार, "राजनीतिशास्त्र सामाजिक विज्ञान का वह अंग हैं, जिसमें राज्य के आधार तथा सरकार के सिद्धांतो पर विचार किया जाता है।

गिलक्राइस्ट के शब्दों में-'राजनीतिशास्त्र में राज्य तयाँ सरकार दोनों का अध्ययन
किया जाता है।

(2) आधुनिक परिभाषा-राजनीतिशास्त्र की आधुनिक परिभाषाओं के सन्दर्भ में इसका अध्ययन निम्न रूप में किया जाता है।

-राजनीतिशास्त्र मानवीय क्रियाओ का अध्ययन है।
-राजनीतिशास्त्र शक्ति का अध्ययन है।
-राजनीतिशास्त्र राजनीतिक व्यवस्था का अध्ययन है।
-राजनीतिशास्त्र निर्णय प्रक्रिया का अध्ययन हैं।

(1) मानवीय क्रियाओं का अध्ययन-जो आधुनिक विद्वान् राजनीतिशास्त्र को मानवीय
क्रियाओं का अध्ययन मानते हैं उनमें कैटलिन, बर्टीन डी जाविनले , सैमुअल हंटटिंगटन जैसे व्यवहारवादी प्रमुख हैं।

कैटलिन के मतानुसार, 'राजनीति विज्ञान संगठित मानव समाज से सम्बन्धित है।
परन्तु मूलतः वह सामुदायिक जीवन के राजनीतिक पहलुओं का अध्ययन करता है।"

 सैमुअल हंटिंगटन के मतानुसार-''राजनीतिक व्यवहार शासन को मनुष्य और समुदाय के कार्यों की प्रक्रिया मानता है और इसका सम्बन्ध शासन के राजनीतिक दलों के , निहित समुदायों के और मतदाताओं की गतिविधियों के अध्ययन से मानता है।

(2) शक्ति का अध्ययन है-जो विद्वान् राजनीति को शक्ति का अध्ययन मानते हैं
प्रमुख रूप से लॉसवेल, मेरियम, मैक्स वेबर, बर्टेंड रसेल, मोरगेतोउ आदि हैं।

लासवेल के मतानुसार-"शक्ति का सिद्धान्त सम्पूर्ण राजनीति विज्ञान में एक बुनियदी
सिद्धान्त हैं। वह आगे कहते हैं समस्त राजनीतिक प्रक्रिया शक्ति के वितरण, प्रयोग एवं प्रभाव
का अध्ययन है।"

(3) राजनीतिक व्यवस्था का अध्ययन विद्वान् राजनीति को व्यवस्था का अध्ययन
मानते हैं उनमें प्रमुख रूप से आमाण्ड, डेविड इंस्टन, एप्टर आदि प्रमुख हैं।

इस सिद्धान्त के समर्थकों के अनुसार राजनीतिशास्त्र सम्पूर्ण समाज या सामजिक
पद्धति का एक अभिन्न अंग हैं और स्वयं समाज की विभिन्न प्रक्रियाओं का बोध कराता है।
इसलिए मनुष्यों के बीच सम्बन्धो में व्यक्त उनके विभिन्न व्यवहारों जिन्हें राजनीतिक व्यवहार
कहा जाता है के समुच्चय के विभिन्न प्रक्रियाओं के कुल के रूप में देखा जा सकता है।

(4) निर्णय प्रकिया का अध्ययन-कुछ विद्वान् राजनीतिशास्त्र को निर्णय निर्माण तथा
निर्णय प्रक्रिया का अध्ययन करने वाला विज्ञान मानते हैं, विगत कुछ वर्षों में निर्णय-निर्माण
का सिद्धान्त काफी लोकप्रिय हुआ है जिसका मुख्य कारण यह है कि राजनीतिक कार्य कलापो
में निर्णय निर्माण के प्रभाव में आमूल चूल वृद्धि हुई है।

उपर्युक्त वर्णित परम्पागत एवं आधुनिक परिभाषाओं के आधार पर निष्कर्षत: यह कहा जा
सकता है कि राजनीतिशास्त्र अत्यन्त व्यापक विषय हैं। यह राज्य सरकार और मानव की
राजनीतिक क्रियाओं का अध्ययन हैं तथा इससे आगे बढ़कर शक्ति, राजनीतिक व्यवस्था तथा
निर्णय प्रक्रिया का अध्ययन हैं।

विषय क्षेत्र (अध्ययन क्षेत्र)

राजनीति विज्ञान की परिभाषा की तरह इसके विषय क्षेत्र में भी विद्वानों में मतभेद है।गार्नर
ने इसके विषय क्षेत्र को तीन भागों में बाँटा है (1) राज्य की प्रकृति तथा उत्पत्ति की खोज (2)
राजनीतिक संस्थाओं के स्वरूप उनके इतिहास तथा विभिन्न रूपों की गवेषणा (3) उक्त
खोज तथा गवेषणा के आधार पर राजनीतिक विकास के नियमों का यथासंभव अनुमान।
       
                गैटिल के मतानुसार, इसके क्षेत्र के अन्तर्गत मुख्यत: तीन बातें सम्मिलित हैं-(1) राज्य
को उत्पत्ति व राजनीतिक संस्थाओं और सिद्धान्तों के अध्ययन {2} विद्यमान राजनीतिक संस्था
और सिद्धान्तों का अध्ययन (3) राज्य का होने वाला आदर्श स्वरूप निश्चित करना।
         1948 के यूनेस्को सम्मेलन में इसके अध्ययन क्षेत्र के अन्तर्गत निम्नलिखित विषय सम्मिलित
करने की वकालत की गई थी जो अग्नलिखित हैं-(1) राजनीतिक सिद्धान्त के अन्तर्गत राजनीतिक
सिद्धान्त तथा राजनीतिक विचारों का इतिहास (2) राजनीतिक संस्थाएँ जिनमें संविधान,
सरकार प्रादेशिक एवं स्थानीय शासन, तुलनात्मक राजनीतिक संस्थाएँ, (3) राजनीतिक दल,
दबाव, समूह एवं जनमत (4) अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध के अन्तर्गत अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति, विधि,
संगठन और अन्तर्राष्ट्रीय प्रशासन। इस सम्मेलन में जो प्रमुख बातें व्यक्त की गई उसके
आधार पर इसके क्षेत्र के अन्तर्गत प्रमुख रूप निम्न बातें आती हैं।

(1) राजनीति विज्ञान के अन्तर्गत सम्पूर्ण मानव जीवन का अध्ययन नहीं किया जाता वरन् राज्य संस्था के सन्दर्भ में ही मानव का अध्ययन किया जाता है।
(2) राज्य के अध्ययन के अन्तर्गत राज्य अतीत, वर्तमान-भविष्य का अध्ययन किया जाता है तथा साथ ही सरकार का भी अध्ययन किया जाता है
(3) राजनीतिशास्त्र के अन्य समाजिक विज्ञान का अध्ययन जिनमें अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, इतिहास
मनोविज्ञान, शिक्षाशास्त्र, भूगोल, नीतिशास्त्र, दर्शनशास्त्र आदि आते हैं।
(4) इसके अध्ययन के अन्तर्गत राजनीति विचारों के इतिहास में सुकरात, प्लेटो, अरस्तु
से लेकर रसेल , कौटिल्य तथा महात्मा गांधी तक विभिन्न विद्वानों के विचारों का
अध्ययन तथा साथ ही साथ समाजवाद, साम्यवाद, गांधीवाद आदि अनेक राजन्नतिक
विचारों का अध्ययन भी किया जाता है।
(5) अन्तराष्ट्रीय कानून, सम्बन्धों और संगठनों के अध्ययन के साथ-साथ राष्ट्रसंघ,
संयुक्त राष्ट्र संध , राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय संगठन जैसे, सार्क, नाम, जी-आठ  तथा अन्य संगठनों का
भी अध्ययन इसके अध्ययन के अन्तर्गत आता है।
उपर्युक्त विवेचन के आधार पर निष्कर्षत: हम कह सकते हैं कि राजनीति विज्ञान का क्षेत्र
अत्यन्त विस्तृत एवं व्यापक है। इसके अन्तर्गत वे समस्त बातें आ जाती हैं जो राजनीतिशास्त्र से सम्बन्धित हैं।

 राजनीतिशास्त्र का अर्थ एवं परिभाषा   Rajniti Shastra ka Arth Avem Paribhasha 

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